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- Tuesday, August 1, 2017
- खाना ठंडा हो रहा है...(काव्य) #ज़हन
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- साँसों का धुआं,
- कोहरा घना,
- अनजान फितरत में समां सना,
- फिर भी मुस्काता सपना बुना,
- हक़ीक़त में घुलता एक और अरमान खो रहा है...
- ...और खाना ठंडा हो रहा है।
- तेरी बेफिक्री पर बेचैन करवटें मेरी,
- बिस्तर की सलवटों में खुशबू तेरी,
- डायन सी घूरे हर पल की देरी,
- इंतज़ार में कबसे मुन्ना रो रहा है...
- ...और खाना ठंडा हो रहा है।
- काश की आह नहीं उठेगी अक्सर,
- आईने में राही को दिख जाए रहबर,
- कुछ आदतें बदल जाएं तो बेहतर,
- दिल से लगी तस्वीरों पर वक़्त का असर हो रहा है...
- ...और खाना ठंडा हो रहा है।
- बालों में हाथ फिरवाने का फिरदौस,
- झूठे ही रूठने का मेरा दोष,
- ख्वाबों को बुनने में वक़्त लग गया,
- उन सपनो के पकने का मौसम हो चला है...
- ...और खाना ठंडा हो रहा है।
- तमाशा ना बनने पाए तो सहते रहोगे क्या?
- नींद में शिकायतें कहते रहोगे क्या?
- आज किसी 'ज़रूरी' बात को टाल जाना,
- घर जैसे बहाने बाहर बना आना,
- आँखों को बताने तो आओ कि बाकी जहां सो रहा है...
- ...और खाना ठंडा हो रहा है।
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- Thumbnail Artwork - Nadezhda Repina
- #मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness #mohit_trendster
- *Second poem in Matlabi Mela (Kavya Comic Series)
- Posted by Mohit Sharma at 11:47 AM
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- Labels: Anuj, Freelance Talents, India, Kavya Comic, Mohitness, nazm, Poems, Poetic Comics, Published, Updates, ज़हन, ट्रेंडस्टर
- Location: Lucknow, Uttar Pradesh, India
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