Not a member of Pastebin yet?
Sign Up,
it unlocks many cool features!
- Friday, May 25, 2018
- सच्चा सैल्यूट (कहानी) #ज़हन
- सर्दी का एक शांत दिन। इस मौसम में तापमान और अपराध काफी कम हो गये थे। वार्सा जंगली देहात में नियुक्त हुए नये थानेदार बिमलेश शर्मा ने फाइलों में गुम दीवान से कहा - "इस बार सरकार सख्त है। आप भी कंप्यूटर सीख लो दीवान जी, नहीं तो 60 से पहले रिटायरमेंट पकड़ा देंगे कप्तान साहब।"
- "4-5 साल बचे हैं सर। अब दिमाग खपा के क्या करेंगे? जब तक वो ऑडिट-शॉड़िंत करेंगे तब तक वैसे ही रिटायर होने का समय आ जाएगा।"
- विमलेश - "अच्छा, थाने के आस-पास ये बुढ़िया कौन घूमती रहती है? इतना मन से सैल्यूट तो सिपाही नहीं मारते जितने मन से वो सैल्यूट करती है।"
- दीवान - "अरे वो पागल है सर कुछ भी बड़बड़ाती रहती है। डेढ़ साल से तो मैं ही देख रहा हूँ और सिपाही तो बताते हैं कि मेरे आने से पहले से है। किसी को उसकी बात भी नहीं समझ आती। शायद बच्चा मर गया करके कुछ कहती रहती है। इसके अलावा कोई शब्द कभी, कोई कभी। पता नहीं चलता कि कौन है, कहाँ की है। बोली से यहाँ की तो लगती नहीं। छोड़ो सर, क्यों टाइम ख़राब करना।"
- इस से आगे सवाल करना "सामान्य दुनिया" के लिए बचकाना माना जाता है इसलिए जिज्ञासा होते हुए भी विमलेश चुप हो गया। थाने में जीप से आते जाते हुए बुढ़िया का दिल से किया हुआ सैल्यूट विमलेश का दिल चीर देता था और उन भोली, सच्ची सी आँखों में झाँकने की तो जैसे उसमे हिम्मत ही नहीं थी। नज़रें फेर कर विमलेश ड्राइवर से बात करने या फ़ोन पर व्यस्त होने का नाटक करता। आखिर सिपाहियों और जूनियर अफसरों के सामने उसे खुद को बचकाना थोड़े ही दिखाना था।
- शहर से दूर स्थित इस जंगली क्षेत्र में सरकार और निजी कंपनियों के विस्तार से वन संपदा नष्ट हो रही थी। जंगल की जनजातियों का निवासस्थान और भोजन के स्रोत कम होते जा रहे थे। बड़े शहरों के न्यायालयों में अंट-शंट विस्तारीकरण तोलना आसान है। पहले तो वहाँ पहुँचते-पहुँचते जंगलों की आवाज़ गुम हो जाती है...उसपर बड़े लोगो के पास अपने अनुसार परिष्कृत चिकनी-चुपड़ी भाषा में न्याय की देवी को बरगलाने का पुराना अनुभव है। आदिवासी रोष का फूलता गुब्बारा फोड़ने के लिए एक दुर्घटना काफी थी। दुर्भाग्य से वो बहुत जल्द हो गयी। निर्माणाधीन बांध का हिंसा टूटने से बहे गाँव से आदिवासियों में बहुत गुस्सा भर गया। उन्होंने आस-पास के सरकारी और निजी संस्थानों को घेरकर तोड़फोड़, आगजनी और वहाँ नियुक्त कर्मचारियों को मारना शुरू कर दिया। दंगे जैसी स्थिति में वार्सा थाना भी चपेट में आ गया। थाने के कुछ सिपाही और सीमित संसाधन आदिवासी फ़ौज के सामने पर्याप्त नहीं थे। बाढ़ से अस्त-व्यस्त हुए रास्तों और बाहर से कट चुके वार्सा की भौगोलिक स्थिति के कारण मदद आने में समय लगता। ऊपर से हिंसा बड़े क्षेत्र में फैली थी इसलिए कुछ दिनों तक वहाँ नियुक्त पुलिस बल को खुद ही जूझना था...पर क्या उनके पास कुछ घंटे भी थे या नहीं?
- भीड़ ने थाने के आस-पास आग लगा दी और धीरे-धीरे अपने और ढाई दर्जन पुलिस बल के बीच दूरी कम करने लगे। स्थानीय लोगों और आदिवासी कर्मचारियों को बक्शा जा रहा था बाकी सभी 'शहरी दानवों' को ख़त्म किया जा रहा था। डाकघर, बांध, नरेगा दफ्तर आदि कार्यालयों को पहले ही स्वाहा कर चुके आदिवासीयों का सामना पहली बार बंदूकधारी 'दुश्मन' से था। हवाई फायरिंग बेअसर रही। कुछ सिपाही जंगलों में भागे और कुछ लड़ते हुए मारे गये। पीछे से उड़ती ईंट लगने के बाद विमलेश बेहोश हो गया। बंद होती आँखों को ये एहसास था कि शायद अब वो दोबारा नहीं खुल पायेंगी।
- आँखें दोबारा खुलीं...सूरज की किरणों को रोकता बुढ़िया का मुस्काता चेहरा विमलेश को देख रहा था। जब उसकी आँखें रौशनी के हिसाब से देखने लायक हुई तो बुढ़िया वापस सैल्यूट की मुद्रा में आ गयी। विमलेश को बीते चार दिनों की कुछ बातें याद आ रही थी। इन 4-5 दिनों में बुढ़िया ने झाड़ियों में टिन-प्लास्टिक के सहारे बने अपने छोटे से बसेरे में विमलेश को आदिवासियों की नज़रों से बचा कर रखा था। उस दिन धुएँ, ऊहापोह के बीच बुढ़िया भगदड़ में जगह-जगह से चोटिल, बेहोश थानेदार को खून के प्यासे आदिवासियों के बीच से घसीट लायी थी। बुखार में तपते, कभी होश में आते तो कभी बेसुध होते विमलेश को बुढ़िया अपने गुज़ारे वाला चीनी का पानी और अपने मुँह से चबाये चने खिला रही थी।
- स्थिति अब काबू में थी और अर्धसैनिक बल, आपातकालीन दल क्षेत्र में फ़ैल चुके थे। बूढी अम्मा के सहारे घिसटता हुआ वह किसी तरह अपने स्टेशन तक पहुँचा। विमलेश पागल बुढ़िया को माँ की तरह अपनाकर उसकी देखभाल करने का फैसला कर चुका था। एम्बुलेंस का इंतेज़ार करते स्ट्रेचर पर पड़े विमलेश की नज़रें बूढी अम्मा को ढूँढ रही थीं, जो लोगो की भीड़ में जाने कहाँ गायब हो गयी थी? मन में कुछ आशंका जन्मीं - "कहीं किसी ने उसे दुत्कार कर भगा तो नहीं दिया? भीड़ देखकर वो दूर तो नहीं चली गयी? नहीं-नहीं!" इतने में भीड़ को किनारे करती बुढ़िया विमलेश को पिलाने अपनी चीनी के पानी वाली पन्नी लेकर आयी। झर-झर बहती आँखों से विमलेश स्ट्रेचर पर लड़खड़ा कर खड़ा हुआ...और बुढ़िया को सैल्यूट करने लगा।
- समाप्त!
- ========
- Art - Nikola S.
- Posted by Mohit Sharma at 3:37 PM
- Email This
- BlogThis!
- Share to Twitter
- Share to Facebook
- Share to Pinterest
- Labels: emotions, Fiction, India, Inspirational, Life, Mohit (Trendster), Mohitness, Story, struggle, मोहित शर्मा ज़हन
- Location: Lucknow, Uttar Pradesh, India
Add Comment
Please, Sign In to add comment