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- THURSDAY, JUNE 20, 2019
- रूठ लो... #Ghazal
- कुछ रास्तों की अपनी जुबां होती है,
- कोई मोड़ चीखता है,
- किसी कदम पर आह होती है…
- पूछे ज़माना कि इतने ज़माने क्या करते रहे?
- ज़हरीले कुओं को राख से भरते रहे,
- फर्ज़ी फकीरों के पैरों में पड़ते रहे,
- गुजारिशों का ब्याज जमा करते रहे,
- हारे वज़ीरों से लड़ते रहे…
- और …खुद की ईजाद बीमारियों में खुद ही मरते रहे!
- रास्तों से अब बैर हो चला,
- तो आगे बढ़ने से रुक जाएं क्या भला?
- धीरे ही सही ज़िंदगी का जाम लेते हैं,
- पगडण्डियों का हाथ थाम लेते हैं…
- अब कदमों में रफ़्तार नहीं तो न सही,
- बरकत वाली नींद तो मिल रही,
- बारूद की महक के पार देख तो सही…
- नई सुबह की रौशनी तो खिल रही!
- सिर्फ उड़ना भर कामयाबी कैसे हो गई?
- चलते हुए राह में कश्ती तो नहीं खो गई?
- ज़मीन पर रूककर देख ज़रा तसल्ली मिले,
- गुड़िया भरपेट चैन से सो तो गई…
- कुछ फैसलों की वफ़ा जान लो,
- किस सोच से बने हैं…ये तुम मान लो,
- कभी खुशफहमी में जो मिटा दिए…वो नाम लो!
- किसका क्या मतलब है…यह बरसात से पूछ लो,
- धुली परतों से अपनों का पता पूछ लो…
- अब जो बदले हो इसकी ख़ातिर,
- अपने बीते कल से थोड़ा रूठ लो…
- ==========
- #ज़हन
- *Published - Ghazal Dhara (June 2019)
- Posted by मोहित शर्मा ज़हन at 8:12 AM
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- Labels: Freelance Talents, Ghazal, Hindi, Life, Mohit Trendy Baba, Mohitness, nature
- Location: Noida, Uttar Pradesh, India
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