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- मोहल्ले का (कु)तर्क गुम हो गया - मोहित शर्मा ज़हन
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- लघुकथा
- "माना राजनीती में कुछ ऊँच-नीच हो जाती है, पर नेता जी हमारे लिए तो अच्छे है। हम लोगो से तो व्यवहार अच्छा है, छोटे-मोटे काम करवा देते है मोहल्ले के और क्या चाहिए? अब समाज का ठेका थोड़े ही ले रखा है हम लोगो ने!"
- ऐसे तर्क होते थे वर्धा ब्लॉक मोहल्ले वालो के जब उन्हें शहर और उसके आस-पास के गाँव-देहात में उनके मोहल्ले की भव्य महलनुमा कोठी मे निवास कर रहे नेता जी एवम उनके गुर्गो की गुंडई, मनमानी के किस्से सुनने को मिलते थे। एक दिन नेता जी द्वारा दर्जनो व्यापारियों से की गयी मारपीट, वसूली के बाद शहर के हज़ारो उपद्रवी व्यापारियों और ऐसा कोई मौका ढूँढ रहे नेता जी के विरोधियों ने मोहल्ले पर धावा बोल, भीड़ का फायदा उठाकर वहाँ के स्थानीय निवासियों से मारपीट, कई गाड़ियों एवम संपत्ति में आगजनी करते हुए नेता जी के घर पर धावा बोल दिया जिसमे उनके कुछ समर्थको, परिवार समेत बर्बर हत्या कर दी गयी।
- इस घटना में गंभीर रूप से घायल नेता जी के शुभचिंतक पडोसी सिंह साहब ठीक होने के बाद दिवंगत नेता जी के लिए कोई तर्क नहीं रखते। उनके दिमाग के उस हिस्से पर गहरी चोट आई जो तर्क समझता और प्रेषित करता है, इस कारण अब वो किसी भी तरह का तर्क नहीं रख पाते....बाकी मोहल्ले वालो के सर में चोटें नहीं आयीं....पर वो भी अब तर्कों को दूर से नमस्ते करते है!
- - मोहित शर्मा ज़हन
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