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- Saturday, July 29, 2017
- साक्षात्कार: देवेन पाण्डेय (इश्क़ बकलोल वाले)
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- देवेंद्र (देवेन) पाण्डेय जी से मेरा परिचय एक कॉमिक कम्युनिटी पर हुआ। वहाँ कई प्रशंसक कॉमिक समीक्षा, फैन फिक्शन, कला, विचार साझा करते हैं। समीक्षाओं, विचारों की सीढ़ी चढ़ते हुए देवेन भाई के लेख कुछ पत्रिकाओं एवम ऑनलाइन पोर्टल्स पर प्रकाशित हुए और अब "इश्क़ बकलोल" के साथ वह साहित्य की दुनिया में अपनी नई पारी शुरू कर रहे हैं। बड़ी उत्सुकता के साथ उन्होंने मुझसे नॉवेल की कहानी साझा की थी और कहानी सुनकर मुझे लगा कि वाकई इस नज़रिये से "इस" कहानी को कहा जाना बहुत ज़रूरी था। यही कारण था कि इस नॉवेल में मेरी काव्य प्रस्तावना है। आज अपनी प्रोटोकॉल तोड़ते हुए अन्य ब्लॉग्स की जगह अपने मुख्य ब्लॉग पर कोई इंटरव्यू पोस्ट कर रहा हूँ। पेश है उनसे हुई ऑनलाइन बातचीत के अंश।
- *) - अब तक दुनिया में बीते लगभग 31 सालों के सफर का सारांश साझा करें।
- देवेन - 31 वर्षो का सारांश? जी यह थोडा कठिन प्रश्न है, 31 वर्षो के अनुभवो को भला सारांश में कैसे बता सकता हूँ? जीवन के अपने अब तक के अनुभवों में काफी कुछ सीखा है, काफी कुछ समझा है जिसे सारांश में समझाना थोडा कठिन है। उतार चढ़ाव हर किसी के जीवन में होते है, मेरे भी है, कुछ अच्छे कुछ बुरे। काफी गलतियाँ की है, काफी मूर्खताए भी की है जिनका अफ़सोस है, लेकिन यह सब जरुरी भी था, अच्छी बुरी सभी घटनाओं की कड़ियाँ जुडकर ही इंसान को परिपक्व बनाती है,और अपनी गलतियों से काफी कुछ सिखने को प्रेरित भी करती है। लोअर मिडल क्लास में जन्म, भरा पूरा परिवार, अभाव के बावजूद कभी कोई अभाव न महसूस होने देने वाले माता-पिता, पढाई में फिसड्डी, शरारती, किन्तु अंतर्मुखी, फिर पढने का शौक जगा, स्कूल की किताबो के अलावा हर किताब में मन लगता था, इस पढने के शौक ने लेखन को जन्म दिया, बस अभी यह सफर जारी है, उम्मीद करता हु आप यही प्रश्न आज से 30 साल बाद पूछे तो और अच्छे से उत्तर दे पाऊं।
- *) - लेखन का कीड़ा कब आपको काटने में सफल हुआ? उस कीड़े को पोषित करने में किन लोगो का षड्यंत्र मानते हैं आप? (यानी किन लोगो को श्रेय देंगे)
- देवेन - लेखन का कीड़ा तो बचपन से ही था, लेकिन वह अलग समय था, उस समय तो बस कल्पनाओं के घोड़े दौडाता और बेसिर पैर की कहानियाँ नोटबुक्स में लिखता। किन्तु किशोरावस्था तक आते आते लेखन स्वयम बंद हो गया,जीवन की आपाधापी काफी कम उम्र में ही आरम्भ हो गई थी, काफी वर्षो बाद जब पहली बार कम्प्यूटर सीखा और शोशल मिडिया से जुड़ा, तब कई लोगो से मित्रता हुई जिनके शौक एक जैसे थे (मेरा मतलब पढने से है), मेरा बचपन चूँकि कॉमिक्स, उपन्यास पढ़ते हुए गुजरा है तो मैंने सबसे पहले उसी संबंधित चीजे इंटरनेट पर खोजी और कुछ ग्रुप्स जो कॉमिक्स फैन्स ने बनाये थे, उनसे जुड़ा, यहाँ आकर पढने का शौक फिर जागा, और इसी के साथ लेखन का कीड़ा कुलबुलाया, यही समय था जब कई अच्छे मित्र बने जिन्होंने अपने मार्गदर्शन से मेरा उत्साह बढ़ाया। यही वह समय था जब मेरा विवाह हुआ, और श्रीमती जी ने मेरे अंदर के लेखक और पाठक को न सिर्फ पहचाना बल्कि मुझे लिखने के लिए प्रोत्साहित भी किया, जिस कारण कुछ फैन फिक्शन लिखे, मोहित शर्मा जी से तभी मित्रता हुई और इनकी बहुमुखी प्रतिभा से बहुत प्रभावित भी हुआ और इन्हें भी फ़ॉलो करता रहा। किशोराव्स्था में फिल्मो का बड़ा शौक था (अब भी बरकरार है ), मेरे मित्र किसी भी फिल्म को देखने से पहले मुझसे पूछा करते थे,और मै उन्हें फिल्म की कहानी, इत्यादि किसी समीक्षक की भाँती बताता था, जब शोशल मिडिया से जुड़ा और ब्लोगिंग से परिचय हुआ (मोहित जी के कारण ), तो मैंने सबसे पहले फिल्मो की समीक्षा लिखने का प्रयास किया, जो समिक्षा न होकर केवल व्यग्तिगत नजरिया था, इसी बिच कुछ लेखन प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया जिसके सूत्रधार मोहित जी ही थे, जिसमे आठवा स्थान प्राप्त किया, जिससे काफी उत्साह बढ़ा, फिर दो एक पत्र पत्रिकाओं में लेखन किया, कुछ वेब पोर्टल्स पर भी लिखता रहा, इन सबसे फायदा यह हुआ के लेखन का निरंतर अभ्यास होता रहा और नई नई चीजे सिखने को मिली। तो कह सकता हु के लेखन के कीड़े को जगाने में मेरी पत्नी, मेरे शोशल मीडिया के मित्रो का विशेष सहभाग रहा है।
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- *) - कॉमिक्स और साहित्य की ऑनलाइन दुनिया में आपका अनुभव कैसा रहा।
- देवेन - ऑनलाइन जुड़ने के बाद से जो सबसे बड़ा फायदा हुआ वह यह के मुझे अपने बचपन का हिस्सा रहे कॉमिक्स निर्माताओ, कथाकारों, साहित्यकारों से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ, इस प्लेटफ़ॉर्म पर आकर मैं कॉमिक्स और साहित्य दोनों क्षेत्रो में आते बदलाओ को देखकर हैरान रह गया, सब कुछ तेजी से बदलता जा रहा था, साहित्य अब केवल भारी-कठिन हिंदी भाषा तक ही सिमित न रह गया था, इसका स्वरूप बदलती फिजा के साथ तेजी से बदला और कई अलग अलग शैलियों ने जन्म लिया l नए-पुराने, जाने-पहचाने,छोटे-बड़े कई लेखको एवं कलाकारों को रूबरू जानने का न केवल अवसर मिला बल्कि इनका काफी सकारात्मक सहयोग एवं मार्गदर्शन भी मिला जिससे मै अभिभूत हुआ। कुल मिला कर यह वह मंच था जिसने मुझे बहुत कुछ सिखाया, समझाया, मार्गदर्शन किया।
- *) - एक प्रशंसक और एक लेखक की सोच में किस तरह के बदलाव देखते हैं?
- देवेन - जहा प्रशंसक पसंद आये किसी भी विधा, लेखन, कला की समिक्षा बेबाकी से कर सकता है, वही लेखक बनते ही यह दायरा न चाहते हुए भी तंग हो जाता है। प्रशंसक उन्मुक्त है, वह अच्छे को अच्छा, बुरे को बुरा, बहुत बुरा कह सकता है, किन्तु लेखक मन इस मामले में थोडा स्वार्थी हो जाता है l वह अपनी राय अब खुलकर नही बल्कि नापतौल कर देता है।
- *) - इश्क-बकलोल उपन्यास के शीर्षक की कहानी क्या है? क्या अन्य टाइटल पर भी विचार किया था? अगर हाँ तो शीर्षक क्या था?
- देवेन - जी इश्क-बकलोल वह पहला नाम नहीं था जिसपर विचार किया गया था, मैंने जब कहानी लिखी थी तब दिमाग में कोई और ही शीर्षक था, ‘’विथ लव फ्रॉम जौनपुर" भी सोचा था, किन्तु कहानी के अनुसार शीर्षक कुछ जंच नही रहा था और थोडा अलग सा चाहिए था जिसमे कुछ नयापन हो और थोडा कैची लगे l नाम से ही उत्सुकता हो जाये के भला यह क्या नाम हुआ? उपन्यास के नायक की हरकते और कहानी को देखते हुए एक और नाम सुझा जिसकी शुरुवात भी ‘इश्क’ से होती थी, किन्तु यह नाम बड़ा ही अभद्र सा लगा, अब पशोपश में था के क्या नाम रखा जाय जो प्रेम की मूर्खताओ पर जंचे, चूँकि कहानी का परिवेश उत्तर भारतीय था तो मुर्ख का पर्यावर्ची शब्द मिला “बकलोल”। और इस तरह से नामकरण हुआ ‘इश्क-बकलोल’, नाम में माथापच्ची करने का श्रेय हमारे सूरज पॉकेट बुक्स के फाउंडर,सम्पादक शुभानन्द जी को भी दूंगा।
- *) - सूरज पॉकेट बुक्स की टीम के साथ काम करना कैसा रहा?
- देवेन - सूरज पॉकेट बुक्स के फाउंडर शुभानन्द जी फेसबुक से बने शुरुवाती मित्रो में से एक है, जिन्होंने मुझे फैन फिक्शन,समिक्षा, ब्लॉग से लेकर अब प्रोफेशनल लेखन करते हुए हर पडाव पर देखा है। मिथिलेश गुप्ता जी भी मेरे शुरुवाती मित्रो में से एक है, और बहुमुखी प्रतिभा के धनी है, इनकी एक एंथोलोजी और एक शोर्ट नॉवेल सूरज पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हो चुकी है। इन दोनों से रूबरू पहली बार आज से लगभग डेढ दो साल पहले मिला था, मिथिलेश जी के उपन्यास के ‘’जस्ट लाइक दैट’’ की रिलीज के समय। इनसे मिलकर लगा ही नहीं के मै इनसे पहली बार मिल रहा हु, शुभानन्द जी का स्वभाव बेहद आत्मीय है, किन्तु काम के मामले में आवश्यक सख्ती बरतते है,जो के आवश्यक है। यदि मै इनसे न मिला होता तो मेरा उपन्यास और लेखन इतना आसान न होता। इनके सानिध्य में काफी कुछ सिखने को मिला जो निरंतर जारी है, शुभानन्द जी खुद भी एक जुनूनी लेखक है, जो फैन से प्रोफेशनल लेखक बने है, हमारी टीम में लगभग सभी एक ही जैसे है भले मिजाज अलग अलग हो, किन्तु सभी फैन से लेखक बने हुए है इसलिए एक बॉन्डिंग है, जिस वजह से कभी साथ काम करते हुए अनावश्यक दबाव या औपचारिकता महसूस नही होती और हम खुल कर अपने किसी भी नए कांसेप्ट पर बिना किसी संकोच के वार्ता कर सकते है,बता सकते है।
- *) - उपन्यास को किस श्रेणी में रखेंगे और क्यों?
- देवेन - उपन्यास के शीर्षक में ही “इश्क” है, इसलिए मेरे न चाहते हुए भी उपन्यास रोमांस की श्रेणी में आ जाता है, किन्तु मै इसे रोमांस की श्रेणी में नहीं मानता हूँ। मेरा खुद का मानना है के रोमांस लेखन शैली में मेरा हाथ बड़ा तंग है, रोमांस लिखने के लिए आवश्यक रुमानियत, खयालो की सपनीली दुनिया, लफ्फाजी इत्यादि मेरे बस का नहीं है, मै शहद में चुपड़े एवं नशीले संवाद लिख ही नही सकता, यह मुझसे होता ही नहीं। उपन्यास में इश्क जरुर है लेकिन इश्क में उपन्यास न है, गाँव है, लोग है, यारी-दोस्ती है, ट्रेजेडी है, इश्क है तो उस इश्क से उपजी ‘बकलोली’ भी है। इसलिए इसे किसी एक जेनर तले मै परिभाषित नहीं कर सकता, बाकी पाठक पढ़ते समय इसे जो जेनर समझे यह वही है।
- *) - लेखन के अलावा आपके और क्या-क्या शौक हैं?
- देवेन - मैने लेखन से पहले पठन शुरू किया था,इसलिए सबसे प्रथम तो मेरा सबसे बड़ा शौक तो पढना ही है। इसके अलावा मुझे नए नए स्थान देखना समझना बेहद पसंद है, अर्थात मुझे घूमना बेहद पसंद है, स्वभाव से घुमक्कड़ हूँ, इसके अलावा फिल्मे भी मेरा पसंदीदा शौक है, मै ढेर सारी फिल्मे देखता हु, फिल्म किसी भी भाषा की क्यों न हो, बस अच्छी हो।
- *) - मुंबई और अपने पैतृक गाँव के जीवन के अंतर को देखकर क्या विचार मन में आते हैं? क्या जीवन के ऐसे ही विरोधाभासी,मार्मिक क्षणों को देखकर मन में लिखने की इच्छा प्रबल होती है?
- देवेन - जौनपुरी मेरी जन्मभूमि है, मुंबई मेरी कर्मभूमि है। मैं जब अबोध था उसी समय मुम्बई आ गया था माता-पिता के साथ, मै अपने 31 वर्षो के जीवन में बमुश्किल 4 से 5 मर्तबा ही अपने गाँव गया हूँl देखिये मुम्बई जो है वह दौड़ता शहर है, यहाँ रोजी रोटी की ऐसी आपाधापी है के आपको सुकून के क्षण बेहद कम मिलते है,लेकिन फिर भी यह शहर ममतामयी है, हर किसी को अपना लेता है। मुंबई का अपना ही आकर्षण है जो के गलत नहीं है,यहाँ ट्रेवलिंग करना सबसे सस्ता है, यहाँ आपको 5 रूपये से 5000 रूपये तक पेट भरने के साधन मिल जायेंगे, यहाँ के लोग भी काफी अच्छे है मिलनसार है, यहाँ उत्सवो की भरमार है, उल्लास है यह शहर। कैसा भी मूड हो आपके मूड के मुताबिक़ कुछ न कुछ ऐसा मिल ही जायेगा जिससे आप सुकून महसूस कर सको। वही उत्तर प्रदेश का मेरा गाँव हर तरह की आपाधापी से कोसो दूर है,यदि आपको सिनेमा देखने की इच्छा हो तो आपको 18 किलोमीटर जाना होगा, छोटा सा शांत गाँव है, खेतो ,नहरों एवं नदी से घिरा हुवा। जब पहली बार गया था तो मै हैरान रह गया था, घर के आंगन में मैंने कभी मोर की कल्पना तक न की थी, किन्तु यहाँ आंगन में मोर घूमते रहते थे, शीतल हवा है, सुख दुःख में एकदूसरे की सहायता करने वाले लोग है, गाँव से 10 किलोमीटर में भी किसी के घर कुछ सुख दुःख हुवा तो सबको खबर हो जाती है,सर्दियों में सरसों के खेत, क्यारियाँ, घने कोहरे इत्यादि कभी मुम्बई में न देखे थे। मुंबई और गाँव के जीवन में जमीन आसमान का अंतर है,विरोधाभास है, मेरे लिए मुंबई और मेरी जन्मभूमि दोनों का समान महत्व है, दोनों का स्वभाव विपरीत है किन्तु एक बात दोनों में समान है, दोनों ही जीवन जीने की कला सिखाती है, एक रोटी तो चैन की नींद देती है। गाँव और मुंबई के कई क्षण है जो लिखने की प्रेरणा देते है, मै अपने भाव अपने लेखन के जरिये व्यक्त करने की इच्छा रखता हूँ।
- *) - आपकी पसंदीदा किताब और लेखको के बारे में बताएं।
- देवेन - मेरा कोई निर्धारित पसंदीदा लेखक नहीं है, मुझे जो किताब पसंद आ जाए वह लेखक मेरा पसंदीदा हो जाता है, फिर भी कुछ पुस्तको का नाम अवश्य लेना चाहूँगा, जैसे रणजीत देसाई की ‘श्रीमान योगी’, शिवाजी सांवत की ‘मृत्युंजय, युगांधर, केशव प्रसाद मिश्र जी की 'कोहबर की शर्त' ,रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की ‘रश्मिरथी,कुरुक्षेत्र’ इत्यादि मेरी पसंदीदा है, मै मुख्यतः ऐतिहासिक,पौराणिक एवं ग्रामीण परिवेश वाली रचनाये पसंद करता हूँ।
- *) - बचपन या किशोरावस्था का कोई यादगार (हास्य) किस्सा बताएं। देवेन - एक बार कक्षा में अध्यापक जी ने कोई कठिन प्रश्न पूछा था जिसका उत्तर किसी को नहीं आता था, मैंने डेस्क के निचे अपनी पुस्तक रखी हुयी थी जिसमे संयोग से मुझे उत्तर दिख गया था। मुझे लगा यही सही अवसर है, उत्तर देकर अपनी धाक जमाता हु, मै कक्षा में वो जो आजकल के लडके कहते है न ‘बैक बेंचर’ उसी श्रेणी का था, मुझसे उत्तर की उम्मीद किसी को भी न थी। लेकिन मैंने झटके से हाथ उपर उठाया,पूरी कक्षा में केवल मेरा हाथ उठा देखकर एकपल को अध्यापक भी हैरान रह गाये, उन्होंने कहा "देवेन्द्र चलो तुम उत्तर बताओ।" मैंने झट से और काफी जोर से किताब में देखी पंक्ति दोहरा दी। अध्यापक बेहद प्रसन्न हुए और मेरी ओर आकर मेरी पीठ थपथपाई, मै गदगद हो गया, सारी कक्षा में मेरे लिए प्रसंशा के भाव दिख रहे थे। और अध्यापक जी ने सारी कक्षा को संबोधित करते हुए कहा "देखो आप सभी देखो, कुछ सीखो इस देवेन्द्र से, कितना आत्मविश्वास है इसमें,कितने आत्मविश्वास से इसने उत्तर दिया, उत्तर गलत था तो क्या हुवा ? इसके आत्मविश्वास ने एकबारगी मुझे भी विचार करने पर विवश कर दिया के शायद मुझे जो उत्तर पता है हो सकता है वही गलत हो, मै देवेन्द्र के गलत उत्तर की बात नही करूँगा, बात करूँगा उसके आत्मविश्वास की उसने उत्तर तो देने का प्रयास किया l" उनके यह शब्द सुनकर तो मेरे पैरो तले जमीन ही खिसक गई के अरे यह क्या हो गया ? उत्तर गलत था ? तब पता चला के मैंने किसी दुसरे प्रश्न का उतर रट लिया था हडबडी में। कक्षा में बड़ी भद्द पिटी, किन्तु आत्मविश्वास पर एक सीख भी मिली।
- *) - 2012 (जब लिखना शुरू किया था) से अब तक खुद में और अपने लेखन में कितना बदलाव देखते हैं?
- देवेन - जब मैने लिखना आरम्भ किया था तो कुछ फैन फिक्शन लिखता जो मेरे कॉमिक्स जूनून से प्रेरित थे, फिर कुछ कहानिया लिखनी शुरू की जिनमे अपरिपक्वता और नौसिखियापन काफी होता था। उन्ही दिनों कुछ कॉमिक्स पब्लिकेशन के लिए दो- तीन स्क्रिप्ट्स भी लिखी जो अप्रूव हो गई जिससे आत्मविश्वास बढा (अफसोस के उनमे से कोई भी प्रकाशित नही हुयी) किन्तु इससे विस्तृत लेखन सिखने को मिला, फिर ब्लॉग से जुड़ा, समिक्षा, विचार इत्यादि लिखने लगा, फिर कुछ पत्र-पत्रिकाओं में भी लेख लिखे, फिर एक लम्बा अवकाश लिया, लेखन से दुरी सी हो गई,अब अवकाश से आया हु तो “इश्क बकलोल “ का सृजन हुआ। मैंने जब लिखना शुरू किया था तब मै बेहद लापरवाह हुवा करता था, बेसब्र भी, जिसकी छाप मेरे लेखन में होती थी, नौसिखियापन और नासमझी साफ़ दिखाई देती थी, और न तब लेखन पर पकड़ होती थी। किन्तु अब काफी सुधार किया है (हालांकि नौसिखियापन अभी भी कायम है), और आगे भी निरंतर सुधार करता रहूँगा, अभी तो केवल सीखना शुरू ही किया है l
- *) - आज से 10-15 सालों बाद खुद को कहा देखते हैं? निजी जीवन,लेखन में भविष्य के लिए क्या लक्ष्य बनाए हैं l
- देवेन - मुझे तो आज का पूछ लीजिये, 10-15 साल बाद का किसे पता है, चूँकि लेखन मेरा शौक है तो जाहिर सी बात है के लेखन में कुछ न कुछ स्थान अर्जित करने का प्रयास अवश्य करूँगा l रही निजी जीवन की बात तो भाई प्राइवेट सेक्टर में हु, आठ घंटे की नौकरी, फिर घर, माता-पिता, पत्नी-बच्चे इन्ही के साथ जीवन बिताना है, वैसे गाँव से कट सा गया हु, जमीन है किन्तु खेती-बाड़ी का ज्ञान शून्य है, तो मेरी दिली इच्छा है के खेती-किसानी भी सिखू और गाँव में कुछ दिन रहकर फसले उगाऊ, ताकि माटी से जुड़ा रहू।
- *) - आज के समाज और बदले परिदृश्य पर आपके क्या विचार है?
- देवेन - आज का समाज पहले से अधिक बेसब्र है, अब हर किसी को विचार व्यक्त करने के आसान एवं सुगम साधन इंटरनेट शोशल मिडिया के रूप में प्राप्त है, हर गली मोहल्ले में,कैफे, रेस्तरा, मॉल , सडको पर वैचारिक क्रांतिया हो रही है। मूल्य घट गए है अब स्वतन्त्रता के मायने के देह और यौन संबंधो के खुलेपन तक ही सिमित रह गए है । अपने ही देश में अपने ही देश की खिलाफ विचारधारा रखने वाली नई जमात पैदा हो रही है, जहा बदलाव की आवश्यकता नही भी है वहा भी जबरदस्ती बदलाव का रोना रोया जा रहा है। लुब्बे-लुबाब यह के असंतुष्टि हद दर्जे तक बढ़ रही है, लोग क्रांतिया कर रहे है लेकिन किस लिए कर रहे है कुछ न पता, आजादी मांग रहे है किन्तु कौन सी आजादी कुछ नही पता। पूंजीवाद के खिलाफ लड़कर पूंजीपति बन रहे है, चर्चा में बने रहने के लिए कुछ भी किया जा रहा है, कुल मिला कर स्थिति बड़ी ही नाजुक है आज के समाज की, केवल व्हाट्सअप के मैसेज मात्र से ही लोगो की जहालत को बाहर आने का अवसर मिल जाता है। पढ़े-लिखो का तबका बढ़ रहा है, उसी अनुपात में पढ़े-लिखे संवेदनहीन लोगो की जमात भी बढ़ रही है।
- *) - इश्क बकलोल के माध्यम से आप क्या संदेश देना चाहते हैं?
- देवेन - देखिये संदेश तो ग्रहण करनेवाले के उपर निर्भर करता है, बाकी मैं कोई संदेश देने में विश्वास नही रखता,यदि किसी को कुछ सिखने को मिलता है, समझने को मिलता है तो यह मेरे लेखन की नहीं पढने वाले की खूबी है।
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- *इश्क़ बकलोल अगस्त 2017 के पहले हफ्ते में अमेज़न और अन्य प्रमुख ऑनलाइन वेंडर पर उपलब्ध होगी। किताब पर अधिक जानकारी के लिए सूरज पॉकेट बुक्स पेज या लेखक देवेन पाण्डेय की फेसबुक प्रोफाइल विजिट करें।
- Posted by Mohit Sharma at 4:46 PM
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- Labels: Book, Deven Pandey, Freelance Talents, India, Interviews, Mithilesh Gupta, Mohit (Trendster), Novel, Shubhanand, Sooraj Pocket Books, Update
- Location: Mumbai, Maharashtra, India
- 3 comments:
- Sahitya DeshJuly 29, 2017 at 10:22 PM
- देवेन जी का साक्षात्कार पढकर अच्छा लगा।
- इनका उपन्यास क्षेत्र में प्रथम प्रयास सफल हो।
- धन्यवाद।
- www.sahityadesh.blogspot.in
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- Bheeshm PathakJuly 30, 2017 at 2:01 PM
- All the very best Deven ji...
- ReplyDelete
- Just Like MitOctober 1, 2017 at 5:49 PM
- एक उभरते लेखक । किताब तो बहुत बढ़िया है
- ReplyDelete
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