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- Wednesday, June 19, 2019
- जब क्रिकेट से मिलने बाकी खेल आए...(कविता) #ज़हन
- एक दिन सब खेल क्रिकेट से मिलने आए,
- मानो जैसे दशकों का गुस्सा समेट कर लाए।
- क्रिकेट ने मुस्कुराकर सबको बिठाया,
- भूखे खेलों को पाँच सितारा खाना खिलाया।
- बड़ी दुविधा में खेल खुस-पुस कर बोले...
- हम अदनों से इतनी बड़ी हस्ती का मान कैसे डोले?
- आँखों की शिकायत मुँह से कैसे बोलें?
- कैसे डालें क्रिकेट पर इल्ज़ामों के घेरे?
- अपनी मुखिया हॉकी और कुश्ती तो खड़ी हैं मुँह फेरे...
- हिम्मत कर हाथ थामे टेनिस, तीरंदाज़ी आए,
- घिग्घी बंध गई, बातें भूलें, कुछ भी याद न आए...
- "क...क्रिकेट साहब, आपने हमपर बड़े ज़ुल्म ढाए!"
- आज़ादी से अबतक देखो कितने ओलम्पिक बीते,
- इतनी आबादी के साथ भी हम देखो कितने पीछे!
- माना समाज की उलझनों में देश के साधन रहे कम,
- बचे-खुचे में बाकी खेल कुछ करते भी...तो आपने निकाला दम!
- इनकी हिम्मत से टूटा सबकी झिझक का पहरा,
- चैस जैसे बुज़ुर्ग से लेकर नवजात सेपक-टाकरा ने क्रिकेट को घेरा...
- जाने कौनसे नशे से तूने जनता टुन्न की बहला फुसला,
- जाने कितनी प्रतिभाओं का करियर अपने पैरों तले कुचला...
- कब्बडी - "वर्ल्ड कप जीत कर भी मेरी लड़कियां रिक्शे से ट्रॉफी घर ले जाएं...
- सात मैच खेला क्रिकेटर जेट में वोडका से भुजिया खाये?"
- फुटबॉल - "पूरी दुनिया में पैर हैं मेरे...यहां हौंसला पस्त,
- तेरी चमक-दमक ने कर दिया मुझे पोलियोग्रस्त।"
- बैडमिंटन - "हम जैसे खेलों से जुड़ा अक्सर कोई बच्चा रोता है,
- गलती से पदक जीत ले तो लोग बोलें...ऐसा भी कोई खेल होता है?"
- धीरे-धीरे सब खेलों का हल्ला बढ़ गया,
- किसी की लात...किसी का मुक्का क्रिकेट पर बरस पड़ा।
- गोल्फ, बेसबॉल, बिलियर्ड वगैरह ने क्रिकेट को लतिआया,
- तभी झुकी कमर वाले एथलेटिक्स बाबा ने सबको दूर हटाया...
- "अपनी असफलता पर कुढ़ रहे हो...
- क्यों अकेले क्रिकेट पर सारा दोष मढ़ रहे हो?
- रोटी को जूझते घरों में इसे भी तानों की मिलती रही है जेल,
- आखिर हम सबकी तरह...है तो ये भी एक खेल!
- वाह, किस्मत हमारी,
- यहाँ एक उम्र के बाद खेलना माना जाए बीमारी।
- ये ऐसे लोग हैं जो पैकेज की दौड़ में पड़े हैं...
- हाँ, वही लोग जो प्लेस्कूल से बच्चों का एक्सेंट "सुधारने" में लगे हैं।
- ऐसों का एक ही रूटीन सुबह-शाम,
- क्रिकेट के बहाने सही...कुछ तो लिया जाता है खेलों का नाम।
- हाँ, भेड़चाल में इसके कई दीवाने,
- पर एक दिन भेड़चाल के उस पार अपने करोड़ों कद्रदान भी मिल जाने!
- जलो मत बराबरी की कोशिश करो,
- क्रिकेट नहीं भारत की सोच को घेरो!
- समाप्त!
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- Posted by मोहित शर्मा ज़हन at 8:28 AM
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- Labels: Freelance Talents, Hindi, Humor, India, Life, Mohit (Trendster), Mohit Sharma Poet, Mohitness, Poem, Social, Society, Sports, मोहित शर्मा ज़हन
- Location: Noida, Uttar Pradesh, India
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