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Sabhya Romani Banjara (Story) - Mohit Sharma Trendster

Mar 10th, 2016
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  1. Thursday, March 10, 2016
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  3. सभ्य रोमानी बंजारा (कहानी)
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  5. अथाह समुद्र से बातें करना मेरा शौक है। यह हर बार मुझे कुछ सिखाता है। मैं सागर किनारे या नाव से किसी टापू पर या फिर सागर के बीचो बीच अक्सर आता हूँ। हाँ, जब कोई बात अक्सर हो तो उस से कभी-कभार बोरियत हो जाती है। वो ऐसा ही एक कभी-कभार वाला दिन था। इतना सीखा था सागर से कि ऐसे दिन झेले जा सकते थे। जब लगा कि अब चलना चाहिए तभी एक बोतल तैरती नज़र आई। वाह! मन में बहुत सी बातें घूमने लगी। क्या होगा बोतल में? किसी ख़ज़ाने का नक्शा, या किसी ऐतिहासिक हस्ती का आखरी संदेश या परग्रहियों की नौटंकी?
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  7. बंद बोतल में कई कागज़ ठूंसे थे। जिनमें कुछ अंग्रेजी में और कुछ किसी और भाषा में। ज़्यादा पढ़े लिखे इंसान की लिखावट नहीं थी उन पन्नो में, जैसे बड़ा-बड़ा बच्चे लिखते है कुछ वैसा था। अंग्रेजी वाले कागज़ पढ़े तो उनमे किसी के लिए कोई संदेश नहीं था। कविताएं, कहानियां थी! लेखन शैली से अंग्रेजी उसकी मातृभाषा नहीं लग रही थी फिर भी लिखने वाले की कल्पना के रोलरकोस्टर में मेरा सर चकरा गया। ख्याल आया कि जिस भाषा में उस लेखक को सहजता होगी, जिसके पन्ने मैं समझ नहीं पा रहा उस भाषा मे उसने क्या-क्या रच डाला होगा। दुनिया पलट देने वाला मसौदा एक जिन्न की तरह बोतल में बंद समुद्र की ठोकरें खा रहा था। अपने स्तर पर उस भाषा को जानने, उसके अनुवाद की कोशिश की पर सफलता नहीं मिली। एक दिन मेरे पिता ने उन कागज़ों को मेरी डेस्क पर देखा और चौंक कर मुझसे उसके बारे में पूछा। मैंने जब सब बताया तो वो भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि यह रोमानी भाषा से निकली किसी बोली में लिखे पन्ने हैं। मैं चौंक गया, आखिर जिस भाषा-बोली की पहचान इतनी भाग-दौड़ के बाद नहीं हो पाई वो मेरे पिता ने देखते ही कैसे पहचान ली? ऐसा क्या लिखा था उन कागज़ों में जो पत्थर से पिता को पिघला दिया?
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  9. कोई सवाल करने से पहले ही उन्होंने बताया कि उनके पिता एक फ्रांस के एक रोमा बंजारे थे। पिता बड़े हुए और शहर की चमक में टोली से अलग हो गए। उस समय (और शायद आज भी) ज़्यादातर यूरोप के लोग रोमा लोगो को गंवार और दोयम दर्ज़े का मानते थे। टोली से अलग होने के बाद मेरे पिता ने अपना अतीत और पहचान बदल ली। किसी आम यूरोपी की तरह उन्हें नौकरी और परिवार मिला। घृणा से भाग कर अब नकली समाज की स्वीकृति मिल गयी थी उन्हें.... पर अब वो अपनी टोली का भोलापन याद करते हैं। वो सादगी जिसमे रिश्ते दुनियादारी से ऊपर थे। उन रोमा भाषा के पन्नो में दूसरे विश्व युद्ध में नाज़ी और सहयोगी दलों द्वारा लाखो रोमा और सिंटी लोगो के नरसंहार के कुछ अंश है। लिखने वाले ने शायद मदद की आस में या मरने से पहले मन को तसल्ली देने के लिए यह सब लिखा।
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  11. "कितनी पीढ़ियों, कितने गुलाम देश, गंवार-पिछड़े लोगों की लाशो के ढेर पर बैठे बड़ी इमारतों और छोटे आसमान वाले ये देश, दुनिया भर में खून की नदिया बहा कर होंठ के किनारे सलीके से रेड वाइन पोछने वाले ये देश अगर सभ्य हैं तो मैं गंवार, पिछड़ा रोमा बंजारा ही सही...."
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  13. पिता ने अपनी पहचान सार्वजानिक रूप से सबके सामने उजागर कर दी। दिल से कुछ बोझ कम हुआ। आधुनिक सभ्य लोगो की लालच की दौड़ में पिछड़े रोमा बंजारे किसी देश को बोझ ना लगें इसलिए मेरे पिता ने अपने स्तर पर जगह-जगह जाकर उन टोलियों में जागरूकता और साक्षरता अभियान की शुरुआत की।
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  15. समाप्त!
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  17. - मोहित शर्मा ज़हन
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  20. नोट - रोमानी समुदाय के लोग सदियों पहले उत्तर भारतीय हिस्सों से यूरोप और खाड़ी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में गए बंजारों के वंशज हैं। उनमे से कई आज भी अलग-अलग देशो में पिछड़ा जीवन जी रहे है। जो अपने लिए कुछ कर पाये वो सामाजिक शर्म या स्थानीय देशों की स्वीकृति के लिए अपनी पहचान बदल चुके हैं। यूरोपीय, दक्षिण अमरीकी व अन्य देशो को अब ये बंजारे बोझ लगते हैं, जिनके पूर्वज इन्ही देशो की गुलामी में पिसते रहे। रोमा लोगो के अपराध की दर पर हमेशा रोना रोया जाता है पर इनकी शिक्षा पर खर्च करने में नानी मर जाती है। अपने क्षेत्रों में दुनिया पर राज करने वाले चार्ली चैपलिन, एल्विस प्रेस्ली जैसे लोगों की रोमानी जड़ें थी। अगर मौका मिले तो उन देशो की अर्थव्यवस्था में अच्छा योगदान दे सकते हैं रोमा लोग। अगर? मौका? यह भी तो इतनी सदियों में उन देशो के नागरिक हैं? जो शायद अन्य प्रवासी लोगो से पहले इन देशो में आये पर कभी इन देशो ने उन्हें अपनाया ही नहीं। हाँ इन्हे जिप्सी, गंवार या कंजड़ जैसे नाम ज़रूर मिल गए।
  21. Posted by Mohit Sharma at 1:09 PM No comments: Links to this post
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  28. Labels: Freelance Talents, Hindi, India, Message, Mohit (Trendster), Mohitness, Story, Update, ट्रेंडी बाबा
  29. Location: Lucknow, Uttar Pradesh 226002, India
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